जानिये डॉ भीमराव आंबेडकर के बारे में सब कुछ - About bhimrao ambedkar i - QuizWine
जानिये डॉ भीमराव आंबेडकर के बारे में सब कुछ - About bhimrao ambedkar in hindi

जानिये डॉ भीमराव आंबेडकर के बारे में सब कुछ - About bhimrao ambedkar in hindi

#डॉ भीमराव आंबेडकर : एक प्रखर विचारक

डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म मध्‍य प्रदेश के शहर इंदौर से 23 किमी. की दूरी पर मुंबई-आगरा मार्ग पर स्थित महू छावनी की एक बैरक में 14 अप्रैल, 1891 को हुआ था। उस समय उनके पिता श्री रामजी राव ब्रिटिश सेना में सूबेदार मेजर के पद पर तैनात थे। डॉ. अम्बेडकर के सम्‍मान में मध्‍य प्रदेश सरकार ने सन 2003 में महू का नाम बदलकर डॉ. अम्बेडकर नगर कर दिया है।

डॉ. आंबेडकर का जन्म महार जाति में हुआ। हालांकि महाराष्ट्र में महार ( दलितों की एक जाति ) जाति के लोग वीर तथा हिम्मत वाले रहे हैं फिर भी उन्होंने सामाजिक विषमता का का दंश झेला है। भीमराव का स्कूल में नाम भीवा राम जी अम्बावडेकर लिखा गया। उनके परिवार का नाम ( कुलनाम ) सकपाल था।

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'भीमराव आंबेडकर' नाम क्यों?
भीमराव आंबेडकर का पूरा नाम भीमराव राम जी राम अंबेडकर था इसके पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है उनकी माता का नाम भीमाबाई था इसलिए माता के इसी नाम से भीम शब्द लिया गया उनके पिता का नाम रामजी राव था। इससे उनके नाम में 'रामजी' शब्द जोड़ा गया।

आंबेडकर के उपनाम का रहस्य यह है कि महाराष्ट्र में अधिकतर उपनाम गांव के नाम पर रखे जाते हैं जो जिस गांव का रहने वाला होता है उसी गांव के नाम के साथ 'कर' लगा कर उसका उपनाम बनाया जाता है। मराठी में 'कर' का वही मतलब होता है जो हिंदी भाषा में 'वाला' का होता है। अंबेडकर के पैतृक गांव का नाम अंबावडे ( महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में ) था। इसलिए प्राइमरी स्कूल में दाखिला दिलाते समय उनके पिताजी ने उनका उपनाम 'अंबावडेकर' लिखवाया था। लंबे समय तक उनका यही उपनाम चलता रहा। जब भीमराव हाई स्कूल में पढ़ते थे तो उनके अध्यापक को 'अम्बावडेकर' शब्द अटपटा लगा इसलिए उन्होंने भीमराव का नाम भीमराव अंबावडेकर के स्थान पर भीमराव अंबेडकर ही हाई स्कूल के रजिस्टर में दर्ज कर दिया।

डॉ आंबेडकर का मानना था कि शिक्षा (ज्ञान )ही ताकत का दूसरा नाम है। इसलिए तरुण अवस्था से ही उन्हें पुस्तकों से ख़ूब लगाव था। जिज्ञासु इंसान थे। पढ़ने-समझने और आसपास के परिवेश को गौर से देखने-समझने की प्रवृत्ति उनमें बलवती थी। आज की पीढ़ी उनके लेखन को पढ़ेगी तभी उनका सही मूल्यांकन कर सकेगी।

जाति- संस्था पर डॉ आंबेडकर के विचार
डॉ आंबेडकर के अनुसार जाति- संस्था न केवल समता पर आधारित समाज के विरुद्ध है अपितु सब मनुष्यों को सम्मान देने की कल्पना के भी विरुद्ध है। जाति नामक संस्था के उद्गम और उसके स्वरूप की खोज करना तथा उसे नष्ट करना उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य बन गया था।

अमेरिका में अध्ययनरत रहते हुए डॉ आंबेडकर ने एक गोष्ठी में 9 मई 1916 को एक निबंध पढ़ा। निबंध का विषय था "भारत में जाति: उद्गम, विकास और स्वरूप"। उस समय वे केवल 25 वर्ष के थे। यह निबंध उनकी वय ( उम्र ) की तुलना में आश्चर्यजनक परिपक्वता, बौद्धिकता तथा आकलन- शक्ति दर्शाता है। यह निबंध वस्तुतः जाति प्रथा के खिलाफ युद्ध का घोषणा पत्र था। इसके बाद के सालों में उन्होंने जन्म पर आधारित जाति प्रथा की बुराई को उजागर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

कुछ विद्वान विभिन्न व्यवसायों को जाति का आधार मानते हैं। कुछ लोग प्राचीन कबीलाई संगठनों में मिश्र प्रजनन और स्थानांतरण से जाति व्यवस्था का उद्भव मानते हैं। अंबेडकर इन स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं थे।
अंबेडकर की प्रस्थापना है कि भारतीय समाज अन्य समाजों की तरह वर्गों में विभाजित था।

अन्य समाजों के समान भारतीय समाज भी चार वर्णों में विभाजित था, ये हैं : (1) ब्राह्मण या पुरोहित वर्ग, (2) क्षत्रिय या सैनिक वर्ग, (3) वैश्य अथवा व्यापारिक वर्ग, (4) शूद्र अथवा शिल्पकार और श्रमिक वर्ग। आरंभ में वर्ग विभाजन के अंतर्गत व्यक्ति दक्षता के आधार पर अपना वर्ण बदल सकता था और इसीलिए वर्णों को व्यक्तियों के कार्य की परिवर्तनशीलता स्वीकार्य थी। उनमें सामाजिक अभिसरण ( social convergence ) होता था। फिर इतिहास की किसी अवस्था में पुरोहित वर्ग ने अपने को समाज से अलग कर लिया और एक बंद नीति अपनाकर ( बंद सामाजिक इकाई बनाकर ) अपनी अलग जाति बना ली। इस तरह स्वयं तक सीमित प्रथा से जातियों का सूत्रपात हुआ। दूसरे वर्ण भी समाज विभाजन के सिद्धांतानुसार अलग-अलग खेमों में बंट गए। कुछ का संख्या बल अधिक था तथा कुछ का नगण्य।

अंबेडकर लिखते हैं कि जब तक समाज का मूल घटक वर्ग था तब तक एक वर्ग से दूसरे वर्ग में आवागमन का मार्ग खुला था। कालांतर में यह व्यवस्था नष्ट हुई और उन उपविभागों में से बंद इकाइयां बनी जिन्हें जाति का नाम दिया गया।

( स्रोत: राइटिंग्स एंड स्पीचिज़, खंड 2 ( मुंबई 1982 ), संपादक- संकलक: वसंतमून, पृष्ठ 472- 73 )

समाज का यह उप-वर्गीकरण स्वाभाविक है, किंतु उपरोक्त विभाजन में अप्राकृतिक तत्व यह है कि इससे वर्णों में परिवर्तनशीलता के मार्ग अवरुद्ध हो गए और वे संकुचित बनते चले गए, जिन्होंने जातियों का रूप ले लिया।

डॉ आंबेडकर के शब्दों में, 'सजातीय विवाह या आत्म-केंद्रित रहना ही हिंदू समाज का चलन था और क्योंकि इसकी शुरुआत ब्राह्मणो ने की थी, इसलिए गैर-ब्राह्मण वर्गों अथवा जातियों ने भी बढ़-चढ़कर इसकी नकल की और वे सजातीय विवाह प्रथा को अपनाने लगे। यहां यह खरबूजे को देखकर खरबूजे के रंग बदलने वाली कहावत चरितार्थ होती है। इसने सभी उप-विभाजनों को प्रभावित किया। इस तरह जातिप्रथा का मार्ग प्रशस्त हुआ। मनुष्य में नकलबाजी की जड़ें बहुत गहरी होती हैं। इस कारण भारत में जातिप्रथा के जन्म की यह व्याख्या पर्याप्त है।'

नकल करने की इस प्रवृत्ति के विषय को गेबरिल टार्डे ने वैज्ञानिक अध्ययन का रूप दिया। उन्हीं के शब्दों में, ''अवसर मिलने पर दरबारी सदा अपने नायकों, अपने राजा या अधिपति की नकल करते हैं और आम जनता भी उसी प्रकार अपने सामंतों की नकल करती है।"
(लॉज ऑफ इमीटेशन (नकल करने के सिद्धांत), अनुवाद : ई.सी. पार्सन्स, पृ. 217)।

डॉ. आंबेडकर पहले भारतीय समाजशास्त्री थे, जिन्होंने हिन्दू समाज में जाति के उद्भव और विकास का वैज्ञानिक अध्ययन किया था। उनके अनुसार जाति प्रणाली में ऐसी कठोर व्यवस्था की गई थी कि जाति के भीतर जाने की बंदिश के साथ जाति से बाहर जाने की भी बंदिश थी। जाति का तर्कशास्त्र इतना कठोर था कि बहिष्कृत होने पर नये-नये समूह लगातार बनते गए। इस क्रूर नियम ने सामाजिक समूहों को असंख्य जातियों में बदल दिया।

तरुण अवस्था में ( 1916 में ) अंबेडकर की यही केंद्रीय प्रस्थापना थी। बाद में उन्होंने महसूस किया कि अनुकरण का सिद्धांत ( Theory of imitation ) जाति जैसे जटिल प्रश्न को स्पष्ट करने में पर्याप्त नहीं है।अतः आगे चलकर उन्होंने छल, बल तथा दार्शनिक एवं धार्मिक पाबन्दियों को भी अपने विश्लेषण में समाविष्ट किया।

अंबेडकर द्वारा प्रतिपादित जाति के सिद्धांत और इसके उन्मूलन के संघर्ष की दूसरी अवस्था सन 1927- 28 में आती है जब उन्होंने बड़ौदा रियासत की नौकरी छोड़कर दलितों के उत्थान के लिए 'बहिष्कृत हितकारिणी सभा' का संगठन किया और उसकी विभिन्न गतिविधियां शुरू की। उन्होंने हिंदुओं के इस दावे का खंडन किया कि विश्व के धर्मों में हिंदू धर्म सबसे उदार और सहिष्णु है। जाति उन्मूलन का जोरदार समर्थन करते हुए उन्होंने कहा:

"हिंदू अपनी मानवतावादी भावनाओं के लिए प्रसिद्ध है और प्राणी जीवन के प्रति उनकी आस्था तो अद्भुत है। कुछ लोग तो विषैले सांपों को भी नहीं मारते। हिंदुओं में साधुओं और हटे- कट्टे भिखारियों की बड़ी फौज है और वे समझते हैं कि इन्हें भोजन- वस्त्र देकर तथा इनको मौज-मस्ती के लिए दान देकर वे पुण्य कमाते हैं...

प्रश्न उठता है कि जिन हिंदुओं ने उदारता और मानवतावाद की इतनी अच्छी परंपरा है और जिनका इतना अच्छा दर्शन है वे मनुष्यों के प्रति इतना अनुचित तथा निर्दयता पूर्ण व्यवहार क्यों करते हैं। हिंदू समाज जाति व्यवस्था की इस्पाती चौखट से बंधा हुआ है जिसमें एक जाति सामाजिक प्रतिष्ठा में दूसरी से नीचे है और प्रत्येक जाति में अपने स्थान के अनुपात में विशेषाधिकार, निषेध और असमर्थताएं हैं। इस प्रणाली ने निहित स्वार्थों को जन्म दिया है जो प्रणालीजन्य असमानताओं को बनाए रखने पर निर्भर हैं।"

( सोर्स मैटेरियल ऑन बाबासाहेब आंबेडकर एंड द मूवमेंट ऑफ अनटचेबल्स खंड 1, पृष्ठ 14-15, मुंबई, 1985, संपादन: बी. जी. कुंटे )

दिसंबर 1935 में डॉ आंबेडकर को लाहौर में जात- पात तोड़क मंडल द्वारा सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया गया। वे यह प्रस्तावना रखना चाहते थे कि जाति व्यवस्था के आधारभूत धार्मिक सिद्धांतों को तोड़े बिना जाति को नहीं तोड़ा जा सकता। उन्होंने अपने भाषण का प्रारूप आयोजकों को भेजा तो उनसे निवेदन किया गया कि वे अपने भाषण से एक विशेष अंश को हटा दें। डॉ आंबेडकर इसके लिए सहमत नहीं हुए और सम्मेलन में भाग लेने का विचार ही छोड़ दिया बाद में यह भाषण स्मारिका के रूप में छपा। यह भाषण जाति व्यवस्था पर डॉ आंबेडकर की सबसे प्रभावशाली कृति है। यह निर्मम तर्क और युक्ति पर आधारित है।

इस कृति में जाति तत्व का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए डॉ आंबेडकर ने कहा कि जाति प्रथा न तो श्रम विभाजन पर आधारित है और न नैसर्गिक क्षमताओं पर। जाति व्यक्तियों के लिए पहले से ही काम निर्धारित करती है, उनकी प्रशिक्षित और मौलिक सुविधाओं के आधार पर नहीं, बल्कि जन्म के आधार पर और माता-पिता के सामाजिक दर्जे के आधार पर।

जाति-व्यवस्था जिन खतरनाक सिद्धांतों पर आधारित है, उससे लोग मानसिक कुंठा का अनुभव करते हैं। डॉक्टर अंबेडकर ने तर्कपूर्ण ढंग से प्रतिपादित किया कि चातुर्वर्ण्य और जाति प्रथा ने भारत को बहुत बड़ी जनसंख्या को स्थाई रूप से अपाहिज बना दिया है। "दुनिया के दूसरे देशों में क्रांतियां हुई हैं। मेरे मन को यह सवाल बराबर परेशान करता रहा है कि हिंदुस्तान में इस तरह की क्रांतियां क्यों नहीं हुई। इसका मैं एक ही जवाब दे सकता हूं कि चातुर्वर्ण्य के कारण हिंदू समाज की छोटी जातियां कोई भी सीधी कार्यवाही करने के लिए बिल्कुल अशक्त हो गई हैं। वे अस्त्र नहीं उठा सकतीं और शस्त्र उठाए बिना कोई विद्रोह नहीं कर सकतीं।"

छोटी जातियों को शिक्षा से वंचित रखा गया, उच्च संस्कृति से वंचित रखा गया। उन्हें ज्ञान के प्रकाश में हिस्सा नहीं दिया गया और गुलाम बनाकर रखा गया। जाति प्रथा की घातक प्रभाव के कारण भारत को अंधकार और अधोगति का शिकार बनना पड़ा। स्वतंत्रता, महानता और गौरव का केवल एक समय आया, मौर्य साम्राज्य के समय जब चातुर्वर्ण्य के बंधन शिथिल हुए।

डॉ आंबेडकर मानते थे कि मात्र जिंदा रहने का कोई महत्व नहीं है। वे जिंदा रहने का ढंग ज्यादा महत्वपूर्ण है। उनका विचार था कि हिंदुओं के अस्तित्व की कहानी लगातार पराजय की कहानी है। पीछे हटना, आत्मसमर्पण करना और गुलामों का जीवन जीना भी जिंदा रहने का एक तरीका है। उन्होंने कहा कि इस तरह के जीने में कोई सुख नहीं है।
( राइटिंग्स एंड स्पीचिज़, क्र.6, खंड1, 66 )

डॉ आंबेडकर ने एक मौके पर सवाल पूछा कि हमारे देश को बार-बार अपनी आजादी क्यों खोनी पड़ी.. ? क्यों हम इतनी बार विदेशियों के अधीन हुए? ख़ुद ही इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि कारण यह था कि हमारा सारा देश हमले के खिलाफ खड़ा नहीं हो सका। हमेशा समाज के एक छोटे से वर्ग ने उनका मुकाबला किया और जब वह पराजित हो गया तो सारा देश विजेता के कदमों पर झुक गया। यह मुख्यतः हिंदुओं की जाति प्रथा के कारण हुआ। युद्ध में यूरोप का उदाहरण देते हुए अंबेडकर ने कहा कि वहां युद्ध में जो सैनिक मरते थे उनकी जगह पर तुरंत नए सैनिक आ जाते थे। वहां पूरा देश लड़ता था, समाज का महज एक हिस्सा नहीं..... चातुर्वर्ण्य की घृणित व्यवस्था थी कि युद्ध में केवल क्षत्रिय ही लड़ेंगे। इसी कारण देश बार-बार गुलाम हुआ। अगर हमें शस्त्र धारण के अधिकार से वंचित न किया गया होता, तो यह देश कभी अपनी आजादी नहीं खोता और कोई भी हमलावर इस पर विजय हासिल करने में कामयाब न होता।
( स्रोत: दस स्पोक अंबेडकर, क्रम 2, खंड 2, पृष्ठ 53- 54, प संपादक भगवानदास ( जालंधर, 1977 )

डॉ आंबेडकर का विचार था कि जाति ईंट की दीवार जैसी कोई भौतिक वस्तु नहीं है। यह एक विचार है, एक मनः स्थिति है। इस मनः स्थिति की नींव शास्त्रों की पवित्रता में है। वास्तविकता यह है कि प्रत्येक स्त्री -पुरुष को शास्त्रों के बंधन से मुक्त किया जाए, उनकी पवित्रता को नष्ट किया जाए, लोगों के दिमाग को साफ किया जाए। तभी वे जात- पात का भेदभाव बंद करेंगे। डॉ आंबेडकर का विश्वास था कि इसका सही उपाय है अंतरजातीय विवाह। जाति का धार्मिक आधार समाप्त हो जाएगा तो इसके लिए रास्ता खुल जाएगा। रक्त के मिश्रण से ही अपनेपन की भावना पैदा होगी और जब तक यह अपनत्व की, बंधुत्व की भावना पैदा नहीं होगी तब तक जाति प्रथा द्वारा पैदा की गई अलगाव की भावना समाप्त नहीं होगी।

डॉ. अम्बेडकर ने अपने लेख Annihilation of Castes में जाति प्रधान देश की पुरातन जड़ों में झांककर देखा और उन्होंने लिखा कि:
'Hindu society is a myth. The name Hindu is itself a foreign name. It was given by the Mohammedans to the natives for the purpose of distinguishing themselves. It does not occur in any Sanskrit work prior to the Mohammedan invasion. They did not feel the necessity of a common name because they had no conception of their having constituted a community. Hindu society as such does not exist. It is only a collection of castes. Each caste is conscious of its existence. Its survival is the be all and end all of its existence. Castes do not even form a federation. A caste has no feeling that it is affiliated to other castes except when there is a Hindu-Muslim riot.'

'हिन्दू समाज एक काल्पनिक धारणा है। हिन्दू शब्द भी विदेशी है। यहाँ के निवासियों को अपने से अलग पहचानने के लिए मुसलमानों ने यह नाम दिया था। मुस्लिम आक्रमण से पहले किसी भी संस्कृत ग्रन्थ मेँ 'हिन्दू' शब्द नहीं मिलता। उस वक़्त इसकी जरुरत ही नहीं समझी गई थी चूँकि एक भिन्न समाज की अवधारणा ही मौज़ूद नहीं थी। वस्तुतः हिन्दू समाज का कोई अस्तित्व ही नहीं है। यह मात्र जातियों का एक संग्रह मात्र है। प्रत्येक जाति अपने अस्तित्व को ही अनुभव करती है और उसे बनाए रखने को प्रयत्नशील रहती है। जातियां एक संघ का निर्माण भी नहीं करती हैं क्योंकि वे एक दूसरी जाति से सम्बद्ध महसूस नहीं करतीं, सिवाय उस वक़्त के जब कोई हिन्दू-मुस्लिम फसाद हो रहा हो।'

‘जाति का विनाश’ में डॉ आंबेडकर वर्णव्यवस्था की कटु आलोचना करते हुए उसे दुनिया की सबसे वाहियात व्यवस्था बताते हैं। उनके अनुसार जाति ही भारत को एक राष्ट्र बनाने के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध है। इसलिए वे कहते हैं, 'अगर भारत को एक राष्ट्र बनाना है, तो जाति को समाप्त करना होगा, और इसके लिए जाति की शिक्षा देने वाले धर्मशास्त्रों को डायनामाईट से उड़ाना होगा।'

The Annihilation of caste ( जाति का विनाश )
व्याख्यान आज भी प्रासंगिक है क्योंकि जाति का प्रश्न हिन्दू समाज का सबसे ज्वलंत प्रश्न आज भी है। इस कृति में डॉ आंबेडकर बहुत ही साफ शब्दों में कहते हैं कि जब तक जाति प्रथा का विनाश नहीं हो जाता तब तक समता, न्याय और भाईचारे की शासन व्यवस्था कायम नहीं हो सकती।

डॉ. अम्बेडकर का विचार था कि जब तक भारत में जाति प्रथा रहेगी, भारत मजबूत नहीं हो सकता। वे जातिप्रथा को राष्ट्र विरोधी मानते थे तथा जाति को सामाजिक जीवन में अलगाव व भेदभाव पैदा करने वाला तत्व मानते थे। जाति- प्रथा लोगों के बीच ईर्ष्या, घृणा और विद्वेष पनपाती और फैलाती है। उनका मानना था कि यदि हम वास्तव में एक राष्ट्र बनाना चाहते हैं तो हमें इन सारी कठिनाइयों पर विजय पानी ही होगी, क्योंकि बंधुता केवल तभी हकीकत बन सकती है जब हम एक राष्ट्र हों। बंधुता के बिना समानता और स्वतंत्रता रंग की पुताई वाली परतों से ज्यादा गहरी नहीं हो सकती।

डॉ आंबेडकर और गांधी जी
गांधी जी और डॉ आंबेडकर दोनों दलितों की स्थिति में सुधार लाना चाहते थे। सवाल उठता है कि क्यों वे रूढ़िवाद और सामाजिक अन्याय के खिलाफ मिलकर नहीं लड़ सके। इसका मुख्य कारण था उनके जन्म और लालन- पोषण की परिस्थितियों की भिन्नता। साथ ही उनके दृष्टिकोणों में बड़ा अंतर था। विचारों की दृष्टि से दोनों में जमीन आसमान का अंतर था।

डॉ आंबेडकर को नाकेवल पश्चिम से प्रेरणा मिली थी अपितु पश्चिम की इहवादी सभ्यता ( materialistic civilization ) ने उनके मन को जीत लिया था। पश्चिम में लोकतांत्रिक विचारों का विकास, समतामूलक विचार की सफलता का ही रूप था। पश्चिम के लोकतांत्रिक आदर्श का सार है, प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिष्ठा और उसके महत्व पर आस्था। हिंदुओं के दार्शनिक विचार असल में उपनिषदों के अंतर्ज्ञान और सहृदय कल्पना के बावजूद लोकतांत्रिक आदर्श का निषेध करने वाले हैं। भारतीय मूल के सभी धर्म अपने तमाम भेदों के बावजूद पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धांत पर विश्वास करते हैं। हिंदुओं के अनुसार वर्तमान जीवन अनेक जीवनों की श्रृंखला की एक कड़ी है और यह जन्म पुनर्जन्म की अंतहीन श्रृंखला में एक पड़ाव है। इसमें एक प्रकार का जमा- घटा का खाता है और अपने वर्तमान जीवन में व्यक्ति को अपने पिछले जन्म के कर्म फल भोगने पड़ते हैं। शास्त्रों के अनुसार अगर कोई व्यक्ति इस जन्म में अच्छे काम करता है तो उसका फल उसे इस जन्म में नहीं, अगले जन्म में मिलेगा। यदि इस जन्म में उसे प्रतिष्ठा का स्थान प्राप्त है तो उसका कारण पिछले जन्म में किए गए अच्छे काम हैं न कि इस जन्म में किए गए काम। इस जन्म में वह जो भी अच्छे काम करेगा, उसका फल उसे अगले जन्म में ही मिलेगा।

इहलोकवाद ( materialism ) का मरणोपरांत जीवन से कोई सरोकार नहीं होता। वास्तव में वह मृत्यु के बाद के जीवन को मानता ही नहीं। वह इस सिद्धांत को मानता है कि व्यक्ति का केवल एक ही जीवन होता है। अतः इस धरती पर सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को इतना पूर्ण बनाया जाना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति, जिसका केवल एक जीवन है, यहां अपनी पूरी क्षमताओं का उपयोग कर सके।

डॉ आंबेडकर के लिए दलित वर्गों की स्थिति में सुधार लाने का सवाल जाति प्रथा के उन्मूलन के साथ जुड़ा हुआ था। वे इस सवाल पर समझौता करने को तैयार नहीं थे।

गांधीजी ने अस्पृश्यता को पाप माना और उसके उन्मूलन के लिए प्रतिज्ञाबद्ध थे। तो फिर गांधी और अंबेडकर एक साथ मिलकर इस दिशा में काम क्यों नहीं कर सके? इसका दो तरह से उत्तर दिया जा सकता है। एक तो यह कि ब्रिटिश शासन और अस्पृश्यता की दो बुराइयों के बारे में अंबेडकर का मूल्यांकन गांधी के मूल्यांकन से भिन्न था। दूसरा उत्तर है कि आंबेडकर अस्पृश्यता के स्वरूप और जाति के स्वरूप में भेद करने को तैयार नहीं थे। उनके लिए दोनों बुराइयां परस्पर संबद्ध थीं। जाति को नष्ट किए बिना अस्पृश्यता को नष्ट नहीं किया जा सकता था। अंबेडकर के लिए भारत में ब्रिटिश राज से बड़ा शैतान जाति व्यवस्था थी। इसलिए उनकी सारी क्षमताएं जाति को नष्ट करने में लगी हुई थीं। वास्तव में वे विदेशी हमलावरों के सामने भारत की बार- बार पराजय का कारण जाति प्रथा से उत्पन्न होती उदासीनता को मानते थे। उन्होंने बिना ग्लानि के कई बार कहा कि उनकी जाति के लोगों ने पेशवाओं के अत्याचारी सामाजिक शासन को नष्ट करने में अंग्रेजों की मदद की थी।
( स्रोत: मधु लिमये, बाबा साहब आंबेडकर : एक चिंतन, 1997 )

अंबेडकर का मिशन भारत को अंग्रेजों के शासन से मुक्त कराने से पहले दलितों को पुरोहितवाद और जाति प्रथा से मुक्त कराना था। रेल मजदूरों को 1938 में संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मजदूरों को दो शत्रुओं से लड़ना है:
" ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद। ब्राह्मणवाद से उनका तात्पर्य एक समूह विशेष से नहीं था। उनका अभिप्राय था कि स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की भावना का निषेध ही ब्राह्मणवाद है। यह केवल ब्राह्मण जाति में नहीं है। यह बुराई सभी वर्गों में है यद्यपि इसकी शुरुआत ब्राह्मणों ने की। इसके विरूद्ध मोर्चा लेना होगा।"
( सोर्स मेटेरियल, क्र 1, पृष्ठ 165 )

दूसरे गोलमेज सम्मेलन में दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व के सवाल पर डॉ आंबेडकर और गांधी जी में झड़प हो गई। गांधीजी अश्पृषयों के विशेष प्रतिनिधित्व के खिलाफ थे। उन्होंने कहा कि इन लोगों को चुनाव से भी ज्यादा इस बात की जरूरत है कि सामाजिक और धार्मिक उत्पीड़न से उनकी रक्षा हो। गांधीजी अस्पृश्यता और उसकी सभी बुराइयों के शीघ्र नाश के प्रति अत्यधिक आशावादी थे।

डॉ आंबेडकर ने गांधी जी के इस विचार का जोरदार विरोध किया। अपनी जानी- पहचानी मुंहफट शैली में उन्होंने कहा : "...अगर सत्ता का हस्तांतरण होना है तो सत्ता एक समूह, एक गुट या एक अल्पतंत्र को नहीं सौंपी जाएगी बल्कि उसमें दलित वर्गों सहित सभी समुदायों की जनसंख्या के अनुपात में भागीदारी होगी।"

कोरेगांव की लड़ाई
कोरेगांव की प्रसिद्ध लड़ाई में ब्रिटिश सेना में महार ( अनुसूचित जाति ) सैनिकों की बहुतायत थी। इस लड़ाई में पेशवा की हार हुई और अंग्रेजों ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया था। उस लड़ाई की यादगार में अंग्रेजों ने कोरेगांव में एक विजय-स्तम्भ बनवाया था। उस पर उन सैनिकों के नाम हैं जो अंग्रेजो की तरफ से युद्ध में वीर गति को प्राप्त हुए थे। इनमें नब्बे प्रतिशत महारों के हैं।
महारों ने ब्रिटिश सेना में नौकरी की, इस बात को लेकर अगर कुछ लोग उन्हें हिकारत की दृष्टि से देखते हैं तो तो उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि जिस बंगाल आर्मी में उत्तर भारत को अंग्रेजों के लिए जीता और सिख शक्ति को नष्ट किया, उसमें मुख्य रूप से ब्राह्मण, राजपूत और अन्य उच्च वर्णीय थे। इन जातियों ने दो हज़ार साल तक साधारण जनता पर अपना वर्चस्व बनाए रखा। तथापि विदेशियों की चाकरी करने में न तो इन्हें शर्म आई और न इनमें देशभक्ति की रंच मात्र भावना ही जागी। वे रोटी के चंद टुकड़ों के लिए अपने को बेचने के लिए तैयार हो गए।
( स्रोत: मधु लिमये, बाबा साहब आंबेडकर :एक चिंतन, 1997 )

जाति प्रणाली के विषय में गांधी और अंबेडकर में कोई मिलन- बिंदु नहीं था। 31 मई 1945 को गांधीजी ने वर्ण व्यवस्था नामक अपने लेख संग्रह की भूमिका लिखी, जिसमें उन्होंने लिखा कि उनके विचार से मनुष्य हर रोज आगे बढ़ता है या पीछे हटता है। वह एक जगह खड़ा नहीं रहता। सारा विश्व गतिशील है। इस नियम का कोई अपवाद नहीं है।
" मेरा यह गलत वक्तव्य होगा अगर मैं कहूंगा कि मैं आज वही हूं जो कल था और भविष्य में भी वही रहूंगा। वस्तुतः मेरे मन में इस तरह की इच्छा भी नहीं होनी चाहिए।" प्रस्तावना के इन शब्दों के बाद उन्होंने लिखा कि सत्य और अहिंसा के बारे में मेरी कल्पना दिन- प्रतिदिन स्पष्टतर होती जा रही है तथापि यह कहना सही नहीं होगा कि वर्णाश्रम के संबंध में मेरे विचार वही है जो पहले थे।
( कलेक्टिड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी, खंड 80, पृ. 222 )

6 मई 1945 को गांधी जी ने अपने एक सहयोगी नरहरी पारिख को लिखा:
"हमें अति शुद्र और सवर्ण हिंदुओं के बीच विवाह को बिना हिचक सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।"
इससे स्पष्ट है कि जाति उन्मूलन के प्रश्न पर महात्मा गांधी के विचारों में परिवर्तन लाने में डॉ आंबेडकर कुछ हद तक सफल रहे।

बौद्ध धर्म के प्रति श्रद्धा
मई 1940 में बीबीसी लंदन द्वारा डॉ आंबेडकर का एक भाषण 'बौद्ध धर्म के प्रति मेरी श्रद्धा क्यों है? और आज की स्थितियों में बौद्ध धर्म संसार के लिए क्यों उपयोगी हो सकता है?' विषय पर प्रसारित किया गया।
बौद्ध धर्म के प्रति अपनी श्रद्धा का कारण बताते हुए डॉ आंबेडकर ने कहा इस धर्म में तीन बातें- प्रज्ञा, करुणा और समता ( prudence, compassion, equality )- ऐसी हैं जो संसार के अन्य किसी धर्म में उपलब्ध नहीं होती। उनकी मान्यता थी कि 'प्रज्ञा' ( prudence ) के सहारे व्यक्ति अंधविश्वास (मिथ्या विश्वास ) और 'दैवी शक्तियों' में विश्वास के प्रकोप से बचता है। 'करुणा' से स्नेह और श्रद्धा के महत्व का पता चलता है, जिससे इंसान से इंसान की निकटता बढ़ती है। तीसरी और अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत 'समता' के बिना तो कोई भी व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठता और निकृष्टता के भाव से मुक्त कर ही नहीं सकता; और इन दोनों भाव के रहते एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के कल्याण की बात सोच भी नहीं सकता। अतः डॉ आंबेडकर का विश्वास था कि इन तीन बातों के बिना मनुष्य का जीवन सुखी प्रसन्न और कल्याणकारी नहीं हो सकता।

आंबेडकर बौद्ध धम्म के हिमायती क्यों?
डॉ. अम्बेडकर गौतम बुद्ध की शिक्षाओं से बहुत प्रभावित थे। 12 मई 1956 को बीबीसी लंदन से वार्ता करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा, “मैं बुद्ध धर्म को प्राथमिकता देता हूं क्योंकि यह एक साथ संयुक्त रूप से तीन सिद्धांत प्रतिपादित करता है, जो कोई और नहीं करता। अन्य सभी धर्म ईश्वर, आत्मा या मरने के बाद के जीवन की चिंता में लिप्त है। बुद्ध धर्म प्रज्ञा की शिक्षा देता है । यह करूणा की शिक्षा देता है। यह समता की शिक्षा देता है। इस धरती पर कुशल व सुखी जीवन के लिए मनुष्य को यही चाहिए। बुद्ध धर्म की इन्हीं तीन शिक्षाओं से मुझे प्रेरणा मिली।”

बुद्ध की शिक्षाओं में अंधविश्वास के लिए कोई जगह नहीं है। कालाम सुत्त में जिसको स्वतंत्र चिंतन का प्रथम घोषणा पत्र कहा जाता है, बुद्ध कहते हैं कि किसी बात को इसलिए मत मानों कि शास्त्रों में ऐसा लिखा है, या कि ऐसा बहुत पहले से हो रहा है या विद्वान और बड़े लोग ऐसा कहते हैं। हर बात को अपने अनुभव की कसौटी पर कसो और जब यह लगे कि यह बात आपके लिए व दूसरों के लिए कल्याणकारी है तभी मानो। मानसिक गुलामी से मुक्ति का मार्ग इसी में है।

( केसमुत्ति सुत्त या कालाम सुत्त : ये भगवान बुद्ध के उपदेश का एक अंश हैं। बौद्ध धर्म के थेरवाद और महायान सम्प्रदाय के लोग प्रायः इसका उल्लेख बुद्ध के 'मुक्त चिन्तन' के समर्थन के एक प्रमाण के रूप में करते हैं। )

बुद्ध के व्यक्तित्व की एक और ख़ासियत से डॉ आंबेडकर बहुत प्रभावित थे। वो है उनके कथनी और करनी में कोई भेद न होना। बुद्ध ने अपने शिष्यों को वही सिखाया जिस पर वे स्वयं चले। ‘यथावादी तथाकारी; यथाकारी तथावादी’। अर्थात जैसा सोचा , वैसा ही किया; जैसा किया, वैसा ही सोचा।

डॉ. अम्बेडकर ने 14 अक्टूबर, 1956 को लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर भारत में लुप्तप्राय हो गए बौद्ध धर्म को पुनःस्थापित किया और एक नई धम्म दीक्षा विधि द्वारा 22 प्रतिज्ञाएं दिलाकर धम्म की जड़ें मजबूत की।

व्यक्ति-पूजा के घोर विरोधी
डॉक्टर अंबेडकर व्यक्ति- पूजा की अपेक्षा सिद्धांतों और मुद्दों को महत्व देते थे। राजनीति में वे व्यक्ति पूजा को पतनोन्मुखी और तानाशाही प्रवृत्ति का द्योतक मानते थे। इसलिए उन्होंने सावधान करते हुए भारतवासियों के लिए व्यक्ति- पूजा को सर्वाधिक घातक बताया था। उन्होंने सचेत किया था कि किसी व्यक्ति के मात्र सम्मानित होने के नाते, किसी स्त्री के मात्र चरित्रवान होने के नाते और किसी देश के मात्र स्वतंत्र होने के नाते उनके प्रति कृतज्ञ नहीं हुआ जा सकता। विशेषकर भारत के लिए तो यह प्रवृत्ति और भी विनाशकारी है। उन्होंने भारत को केवल राजनीतिक लोकतंत्र प्राप्त करके संतुष्ट हो जाने की अपेक्षा सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र प्राप्त करने की भी कामना की क्योंकि वे जानते थे कि भारतीय समाज में आर्थिक और सामाजिक रूप से भारी असमानताएं व्याप्त हैं। अंत में उन्होंने भारत राष्ट्र को एक राष्ट्र के रूप में बनाने के लिए पृथकतावादी जाति- व्यवस्था को समाप्त करके जाति विहीन समाज की स्थापना करने की बात को रेखांकित किया।

लोकतंत्र के प्रबल समर्थक
संविधान सभा में संविधान के गुणविशेष के बारे में बोलते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि संविधान कितना भी अच्छा हो, यह आखिर में राज्यकर्ताओं ( शासन करने वालों ) के संविधान के इस्तेमाल करने पर ही निर्भर होगा कि वह अच्छा है या बुरा। भविष्य की चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि भारत को भारत की जनता के खुद के ही विश्वासघात से, देशद्रोह करने से ही उसे अपनी स्वतंत्रता गंवानी पड़ी है। इतिहास इसका साक्षी है। जब मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर हमला किया तब राजा दाहर के सेनापति ने मुहम्मद बिन कासिम के मुनीम से रिश्वत लेकर अपने राजा की ओर से लड़ने से साफ इनकार कर दिया। मुहम्मद गोरी को हिन्दुस्तान पर हमला करने का आमंत्रण देकर पृथ्वीराज के खिलाफ लड़ने का आमंत्रण देने वाला शख्स जयचन्द था। उसने मुहम्मद गोरी को सोलंकी राज्य की और अपनी सहायता देने का वचन दिया था। जब शिवाजी महाराज स्वतंत्रता के लिए युद्ध कर रहे थे, तब अन्य मराठा सरदार और राजपूत तो मुगल बादशाह की ओर से लड़ रहे थे। जब सिख शासकों के खिलाफ ब्रिटिश लड़ रहे थे तब उनके सेनापति चुप बैठे थे। सिखों की स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए उन्होंने बिलकुल प्रयास नहीं किए। ऐसे ही 1857 में भारत के बड़े भाग में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई छेड़ी तब अधिकांश रियासती राजा उसमें शामिल नहीं हुए।

दूरदर्शी डॉ. अम्बेडकर ने क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षा को भांपते हुए इस बात की ओर इशारा किया कि अगर क्षेत्रीय दलों ने अपने दल का मत राष्ट्रहित की अपेक्षा श्रेष्ठ मानने लगे तो भारतीयों की स्वतंत्रता दूसरी बार खतरे में पड़ जायेगी और शायद वह स्थायी रूप से नष्ट हो जाएगी।

राष्ट्रीयता पर डॉ आंबेडकर के विचार
डॉ आंबेडकर की दृष्टि में सही राष्ट्रवाद है जाति भावना का परित्याग। जाति भावना एक तरह से सांप्रदायिकता का ही रूप है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है जब मानव के बीच जाति, नस्ल और रंग का अंतर भुलाकर उसमें सामाजिक भ्रातृत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाए। राष्ट्रवाद के संदर्भ में अल्पसंख्यक और बहुमत के विषय में डॉ अम्बेडकर कहते हैं:
'अल्पमत द्वारा जब सत्ता में कुछ अधिकार मांगे जाते हैं तो वह सांप्रदायिक हो जाता है परंतु बहुमत के बल पर जब सत्ता पर एकाधिकार जमा लिया जाता है तो उसे राष्ट्रीयता कहा जाता है।'

डॉ आंबेडकर कहते थे कि शासक जातियां यह बात जानती हैं कि वर्ग सिद्धान्त, वर्ग हित और वर्ग संघर्ष उनका विनाश कर देगा, इसलिए सताये हुये वर्ग का ध्यान बांटने के लिए उसे राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता का नाम लेकर बहका दिया जाए। उन्होंने कहा कि ऐसा राष्ट्रवाद नहीं होना चाहिए जो दूसरे समुदाय या राष्ट्र के प्रति निर्दयता या भय प्रकट करता हो। उन्होंने कहा कि उस समय तक राष्ट्रवाद निरर्थक है जब तक राष्ट्रीयता की भावना विद्यमान न हो।

संविधान सभा में कुछ सदस्यों ने संविधान की प्रस्तावना में “भारत के लोग” के स्थान पर 'भारत राष्ट्र' लिखने की मांग की। इस पर डॉ आंबेडकर ने उनसे पूछा; “हजारों जातियों में बंटे लोग एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं? जितनी जल्दी हम यह समझ जाएंगे कि सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अभी हम एक राष्ट्र नहीं हैं, उतना ही अच्छा है।”
( स्रोत: आनंद श्री कृष्ण, दलित दस्तक, जुलाई 2016)

ये लेख परोफेसर हनुमानाराम ईसराण द्वारा लिखा गया है
पूर्व प्राचार्य, कॉलेज शिक्षा, राज.

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